तीन दशक से लखनदेई को कल-कल धारा का इंतजार, मिला सिर्फ आश्वासन

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नेपाल से निकलकर सीतामढ़ी के विभिन्न प्रखंडों से होते हुए सीतामढ़ी शहर से गुजरते हुए मुजफ्फरपुर जिले में प्रवेश करती है। पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रसिद्ध लखनदेई(लक्षमणा) नदी को पिछले तीन दशक से कल-कल धारा का इंतजार है। विगत तीन दशक से लखनदेई नदी में जल प्रवाह नहीं हो रहा है। नदी की धारा में मिट्टी भराव होने से नेपाल से ही नदी की धारा बंद है और नेपाल से ही रास्ता बदलकर नदी की नई धारा एक किलोमीटर पूरब छोटी भारसर होकर भारत में प्रवेश कर नए क्षेत्र मे तबाही मचा रही है।
इस नदी की पुरानी धारा की उड़ाही के लिए हुए लंबे संघर्ष के बाद इसकी उड़ाही कर पुरानी धारा में पानी लाने का काम शुरू हुआ लेकिन यह अब तक यह अंजाम तक नहीं पहुंचा। जिससे यह आज भी यह नदी नाला के रूप में मृत प्राय स्थिति में है। इस चुनावी शोर में इस मुद्दे की ओर किसी भी राजनीतिक दल का ध्यान नहीं है।


जगह-जगह नदी के किनारों का हो चुका अतिक्रमण

सोनबरसा प्रखंड अंतर्गत खाप-खोपराहा में प्रवेश करती हुई लक्ष्मणा(लखनदेई)नदी बथनाहा,रीगा,डूमरा तथा रून्नीसैदपुर प्रखंड होते हुए मुजफ्फरपुर जिला मे प्रवेश करती है। लखनदेई नदी की धारा से न केवल खेतों की सिंचाई, भू -जलस्तर बनाए रखने, मानव तथा पशु के इस्तेमाल के लिए उपयोगी होता था। लेकिन अब इस सुविधा से जहां लोग वंचित हो रहे हैं व पर्यावरण की दृष्टि से भी उचित नहीं है।


इस नदी का पौराणिक, आध्यात्मिक तथा धार्मिक महत्व भी है। धार्मिक मान्यता है कि लखनदेई सीता की सहेली है। इन सारे महत्व के बावजूद सरकारी उदासीनता से विगत तीन दशक से लखनदेई नदी में जल प्रवाह नहीं हो रहा है।

नदी की धारा मे मिट्टी भराव होने से नेपाल से ही नदी की धारा बंद है और नेपाल से ही रास्ता बदलकर नदी की नई धारा एक किलोमीटर पूरब छोटी भारसर होकर भारत में प्रवेश कर नये क्षेत्र मे तबाही मचा रही है। वहीं, शहर से होकर गुजरने वाली यह नदी अभी नाला के स्वरूप में हैं। धारा पतली हो जाने से नदी के तट का जगह-जगह अतिक्रमण कर घर बना लिए गए हैं।
नदी में गंदे पानी बहाव होने से इसका पानी भी प्रदूषित हो चुका है। पांच प्रखंडों के हजारों एकड़ जमीन की ङ्क्षसचाई, बढ़ते जलसंकट की स्थिति में लाखों लोगों के लिए भू जल स्तर को स्थिर रखने, सभी जीवों के उपयोग के लिए जल की उपलव्धता तथा आध्यात्मिक तथा धार्मिक महत्व को देखते हुए लखनदेई नदी में शीघ्र जल प्रवाह जरूरी है।



बंद धारा को पुनर्जीवित करने के लिए हुआ लंबा संघर्ष

नदी की बंद धारा को पुनर्जीवित कर जल प्रवाह कायम करने के लिए वर्षो से सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा सीतामढ़ी की धरती से संघर्ष शुरू हुआ। लखनदेई नदी की उड़ाही की मांग को लेकर शुरूआती दौर में सामाजिक कार्यकर्ता महिला नेत्री शाहिन परवीन ने आवाज बुलंद की। धरना-प्रदर्शन भी किया, इसे लेकर उनके खिलाफ मामला भी दर्ज हुआ। इसके अलावा सामाजिक कार्यकर्ता शशि शेखर, डा.वसंत मिश्रा ने भी आवाज बुलंद कर आंदोलन को धार दी। जिला प्रशासन से लेकर सरकार तक समस्या को ले जाया गया। लेकिन आश्वासन के सिवा कोई कार्रवाई नहीं हुई।
वर्ष 2015 में कतिपय सामाजिक कार्यकर्ताओं रामशरण अग्रवाल, डॉ. आनंद किशोर, जयकिशोर ललित आशा प्रभात, मनोज बैठा, राज किशोर राय सहित अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओ ने इस दिशा में सीमावर्ती सोनबरसा में वहां के प्रभावितों के साथ बैठककर समस्याओं के समाधान की दिशा में पहल की तथा लखनदेई बचाओ संघर्ष समिति का गठन कर अभियान तेज किया। इलाके का दौरा कर समिति इस निर्णय पर पहुंची कि भारतीय क्षेत्र में ही लखनदेई की नई धारा को छोटी भारसर से दुलारपुर घाट तक तीन किलोमीटर में नहर के माध्यम से पुरानी धारा में जोड़कर तथा पुरानी धारा में आगे सफाई तथा उड़ाही कर जलप्रवाह कायम किया जा सकता है।
इस प्रस्ताव के साथ समिति के सदस्य तत्कालीन डीएम राजीव रौशन से मिला। उन्होंने सरकार के स्तर से भी इस योजना के कार्यान्वयन मे पहल की। अंतत: सीएम नीतीश कुमार दुलारपुर घाट आकर योजना का शुभारंभ किया। लेकिन अब तक दुलारपुर घाट से सीतामढ़ी के बीच 18 किलोमीटर नदी की खुदाई हो चुकी है। जमीन अधिग्रहण तथा अधिग्रहित जमीन के मुआवजे की राशि के भुगतान की कार्रवाई में विलंब से दुलारपुर घाट से छोटी भारसर के बीच के तीन किलोमीटर की खुदाई शेष है। इस योजना को 2018 में ही पूरा हो जाना था वह इस वर्ष बरसात शुरू होने से पूर्व यह पूरा हो पाता है या नहीं यह भविष्य के गर्त में है।

रिपोर्ट : अवध बिहारी उपाध्याय ( दैनिक जागरण )



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