कारगिल हीरो : शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी के पुण्यतिथि पर विशेष

0

मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी की वीरगाथा को याद करते हुए आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं और सीना चौड़ा हो जाता है। भारत मां के वीर सपूत बहादुरी से लड़ते हुए कारगिल युद्ध में शहीद हो गए। इनकी शहादत और वीरता की कहानी बच्चे-बच्चे की जुबान पर है।

2 जनवरी 1961 को शिवहर जिले पुरनहिया प्रखंड स्थित चंडीहा गांव में जन्मे चंद्रभूषण द्विवेदी को कर्नल के पद पर प्रोन्नति मिली थी। उस समय वे जम्मू में मेजर के पद पर कार्यरत थे। इन्हें ग्वालियर जाना था। पत्नी सिलीगुड़ी में थी। प्रोन्नति की जानकारी परिजनों को दिया और ग्वालियर जाने की तैयारी करने की बात कही। परिवार में सभी खुश थे। बच्चे छुट्टियां मनाने सीतामढ़ी आए थे। छुट्टियां समाप्त होने के बाद बच्चे लौट गए और इस बार सपरिवार ग्वालियर जाने की तैयारी में जुट गए।


इसी बीच फरमान आया कि कारगिल में युद्ध शुरू है। फरमान मिलते ही चंद्रभूषण द्विवेदी ने कमान संभाला और युद्ध में सेना के साथ कूद पड़े। 2 जनवरी 1999 का वह दिन जब सूचना मिली कि मेजर द्विवेदी बहादुरी के साथ लड़ते हुए शहीद हो गए। इसके बाद उन्हें आज तक कर्नल का दर्जा नहीं दिया गया। जिसका मलाल परिजनों को सता रहा है। शहीद की कहानी परिजन की जुबानी कारगिल शहीद मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी की पत्नी भावना द्विवेदी अपने दोनों बेटियों के साथ दिल्ली में रह रही है। वह दिल्ली में ही पेट्रोल पंप का संचालन कर रही है।

बड़ी बेटी नेहा द्विवेदी एमबीबीएस की है। नेहा की शादी एक मिलिट्री मैन से हुई है। क्योंकि पिताजी की इच्छा थी के बड़ी बेटी की शादी किसी मिलिट्री ऑफिसर से हो। छोटी बेटी दीक्षा द्विवेदी एक निजी चैनल में काम कर रही है। कारगिल शहीद स्व. द्विवेदी की ज्येष्ठ डॉ. रेणु चटर्जी आंखें वीर गाथा की वृतांत सुनाते हुए नम हो जाती है लेकिन सीना खुशी से चौड़ा हो जाता है कि देश के खातिर जो बलिदान दिया है यह सबको नसीब नहीं होता। बताती है कि उस समय 15 दिन की टूर पर अपने बेटे के पास अमेरिका गई थी। दो चार दिन ही हुआ था कि सूचना मिली की चंद्र भूषण द्विवेदी कारगिल युद्ध में शहीद हो गए। लौटना आसान नहीं था। लेकिन जब अमेरिका के ऑफिसरों से इस बात की जानकारी दी तो उन्होंने बड़ी आसानी से लौटने का परमिशन ग्रांट कर दिया गया। फ्लाईट से पटना एयरपोर्ट पहुंची जहां पार्थिव शरीर पहुंच चुका था। बाढ़ का समय था।


बिहार सरकार ने हेलीकॉप्टर की व्यवस्था की और वहां से साथ साथ चंडीहा पहुंची। जहां अंतिम संस्कार किया गया। बताते है कि आज इस बात का मलाल रह गया कि मरने के बाद शहीद को एक आर अंतिम प्रोन्नति मिलती है। मेजर द्विवेदी को कर्नल में प्रोन्नति मिली थी लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद वे प्रोन्नति को छोड़ लड़ाई के मैदान में कूद गए। युद्ध में शहादत मिली लेकिन आज तक उन्हें कर्नल में प्रोन्नति नहीं दी गई। मध्य विद्यालय नगरपालिका को मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी के नाम पर नामाकरण का प्रस्ताव अभी कागज में ही सिमटा हुआ है। गांव में न तो इनके नाम से रोड बना और न ही स्कूल खोला गया। एक सामुदायिक भवन का निर्माण किया गया है वह भी जीर्णशीर्ण अवस्था में है।

कारगिल चौक के अलावा स्कूल में स्थापित हुई स्मारक एवं बाल वाटिका कारगिल शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी के नाम पर शहर में कारगिल गेट बनाया गया है और इस स्थान का नाम कारिगल चौक रखा गया है। वहीं शहर में स्थापित नगरपालिका मध्य विद्यालय परिसर में स्मारक एवं बाल बाटिका का निर्माण कराया गया है। जिसका उद्घाटन 16 जुलाई 2002 को तत्कालीन जिलाधिकारी अतिश चंद्रा एवं एसपी अनुपमा एस निलेकर ने किया था। इनके पैतृक गांव चंडीहा में स्मारक का निर्माण कराया गया है।



Comment Box