आपातकाल का काला अध्याय भारत की जनता के लिए बहुत बड़ा सबक है

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आपातकाल लगाने के एक दिन बाद, सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया. विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और मीडिया पर पूरी तरह से नकेल लगा दी गई थी. क्या हम आज वो दिन देखना चाहेंगे?

आज भी जब कोई 43 साल पहले भारत में लगे आपातकाल को याद करता है तो उसकी रूह कांप उठती है. कुछ ही मिनटों में तत्कालीन केंद्र सरकार ने लगभग भारतीय संविधान का अपहरण ही कर लिया था. नागरिकों के मौलिक अधिकारों सहित सभी संवैधानिक अधिकारों को जबरन हटा दिया गया था. विपक्षी नेता और सिविल सोसाइटी के लोग 25 जून, 1975 के उस काले दिन को नहीं भूल सकते जब इंदिरा गांधी ने घोषणा की थी कि राष्ट्रपति ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया है.
हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी के पास आपातकाल घोषित करने के कई कारण हों. लेकिन ये न तो जरुरी था और न ही इसके लिए कोई वैध कारण थे. सिर्फ इस बात की आशंका पर कि विपक्ष देश में अशांति पैदा कर सकती है आपातकाल लागू करने का कोई आधार नहीं बनता है. बेशक, उस समय सरकार की विफलता को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे, लेकिन फिर ये असंतोष और विरोध ही तो एक स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं. यह आपातकाल लगाने के लिए आधार नहीं हो सकता है.

26 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा होने के बाद दि हिंदू का पहला पन्ना


राजनीति के जानकारों का मानना है कि अगर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द नहीं किया होता, देश को आपातकाल जैसे काले दिन को नहीं देखना पड़ता. 12 जून, 1975 को, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में कदाचार के लिए दोषी मानते हुए उन्हें उस श्रेणी में किसी भी निर्वाचित पद को रखने से वंचित कर दिया था. माना जाता है कि 25 जून, 1975 को भारत में आपातकाल लगने के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा का यही फैसला था.

1971 में इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश में रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीता था. इस चुनाव में उन्होंने समाजवादी नेता राज नारायण को बड़ी ही आसानी से हरा दिया था. राज नारायण ने ही बाद में चुनावी कदाचार और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर इंदिरा की जीत को चैलेंज किया था.


आरोप लगाया गया था कि उनके चुनाव एजेंट यशपाल कपूर एक सरकारी कर्मचारी थे और उन्होंने व्यक्तिगत चुनाव से संबंधित काम के लिए सरकारी अधिकारियों का इस्तेमाल किया था. चुनावी कदाचार के लिए इंदिरा गांधी को दोषी ठहराते हुए न्यायमूर्ति सिन्हा ने उन्हें संसद से अयोग्य घोषित कर दिया था और उनपर किसी भी चुने हुए पद को रखने से छह साल के प्रतिबंध लगा दिया था.

इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री का पद नहीं छोड़ने की ठान ली थी

अदालत के फैसले के बावजूद इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं थी. विपक्षी नेताओं के पास इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली इस सरकार के असंगत रवैये के खिलाफ सड़कों पर उतरने और विरोध करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. इस कड़वाहट को कम करने और इस मुसीबत से बाहर निकलने के लिए इंदिरा गांधी कानूनी रास्ता अपना सकती थी और राजनीतिक रूप से इसे लड़ सकती थी. लेकिन इसके बजाय, देश के लोगों को आपातकाल मिला. एक ऐसा कदम जो लोकतंत्र के बिल्कुल उलट और विरोधी है.

दिलचस्प बात यह है कि आपातकाल लगाने के एक दिन बाद, सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया. विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और मीडिया पर पूरी तरह से नकेल लगा दी गई. उनके कुछ भरोसेमंद सरकारी अधिकारियों की मंजूरी के बिना कोई खबर नहीं छापी जा सकती थी. भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को बलपूर्वक छीन लिया गया था. उस समय देश में संसद और विपक्षी कार्यवाही नहीं थी.

आज की बात करें तो क्या हम इस तरह के तानाशाही नियम को स्वीकार कर सकते हैं?

आपातकाल के काले दिनों को याद करते हुए, इसे सिर्फ “दुःस्वप्न या फिर बुरा सपना” भर कहकर इसकी आलोचना करना ही पर्याप्त नहीं है. हमें एक संकल्प लेना होगा कि हम भारत को फिर से ऐसा कोई काला दिन नहीं देखने देंगे. हमें अपने वैधानिक अधिकारों से अवगत होना चाहिए ताकि कोई भी आप पर आपातकालीन प्रतिबंधों को लागू न कर सके.

आज नहीं, कल नहीं, कभी भी नहीं.

लेखक

प्रवीण शेखर

प्रवीण शेखर @praveen.shekhar.37

लेखक इंडिया ग्रुप में सीनियर प्रोड्यूसर हैं



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