PM नरेंद्र मोदी के फीडबैक में तीसरे चरण के वैक्सीनेशन में उजागर हुई खामियां, जानें क्‍या है मामला

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एक मई को शुरू हुए टीकाकरण में केंद्र के साथ साथ राज्यों ने भी अपने सिर पर वैक्सीनेशन का जिम्मा लिया था। यह तय हुआ था कि 18-45 के बीच आयुवर्ग को राज्य अपने फंड से वैक्सीन देगा। लेकिन प्रधानमंत्री को पहले 15 दिन में महसूस हो गया था कि नई व्यवस्था में खामी है। इसके बाद उन्होंने उच्चस्तरीय बैठक कर इसके बारे में फीडबैक लेना भी शुरू कर दिया था। 21 मई को उन्होंने उच्च स्तरीय समिति को वैक्सीनेशन का वैकल्पिक मॉडल बनाने का आदेश भी दिया।

नए मॉडल पर उच्चस्तरीय समिति के प्रजेंटेशन और बाद में उसमें कुछ संशोधनों के बाद एक जून को इसे अंतिम रूप भी दे दिया गया था। सोमवार को प्रधानमंत्री ने इसी का एलान किया। नीति आयोग के सदस्य और वैक्सीनेशन पर उच्चाधिकार समिति के प्रमुख डाक्टर वीके पाल के अनुसार 21 मई को प्रधानमंत्री ने फिर से उच्चस्तरीय बैठक में फीडबैक का प्रजेंटेशन देखने के बाद वैकल्पिक वैक्सीनेशन अभियान की रूपरेखा तैयार करने का आदेश दिया। तीन बाद उच्च स्तरीय समिति ने सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक के अधिकारियों के साथ बैठकर उनसे राज्यों को वैक्सीन सप्लाई करने में आ रही दिक्कतों के बारे में जानकारी ली।


दूसरी ओर स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों के स्वास्थ्य मिशन के प्रमुख और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श कर वैक्सीनेशन अभियान की कमियों और उन्हें दूर करने के उपायों पर चर्चा। दरअसल वैक्सीनेशन के तीसरे चरण की शुरुआत होते ही प्रतिदिन लगने वाले डोज की संख्या गिरनी शुरू हो गई थी और एक दिन तो यह आठ लाख तक पहुंच गई थी। अप्रैल महीने में प्रतिदिन लगभग 30 लाख डोज मई महीने में 16 लाख डोज तक आ गया था। शुरू में यह समझा गया कि राज्यों और निजी क्षेत्र की खरीद प्रक्रिया में शामिल होने के कारण शुरूआती दिक्कत आ रही है और धीरे-धीरे यह ठीक हो जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी भी यह सफाई दे रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री को लग गया था कि इसमें मूलभूत खामियां हैं और उसे दूर किये बिना टीकाकरण की गति तेज नहीं हो पाएगी।



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