जाने कैसे तैयार होता है बजट और क्या है हलवा रस्म???

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हर साल बजट पेश होता है. पहले फरवरी के महीने के आखिरी वर्किंग डे पर वित्त मंत्री इसे संसद में पेश करते थे, लेकिन साल 2017 से इसे 1 फरवरी के दिन पेश किया जाने लगा.

अब इस साल दो बार बजट पेश हुआ. पहली बार 1 फरवरी के दिन, और दूसरी बार 5 जुलाई के दिन. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इस साल लोकसभा चुनाव हुए थे. अप्रैल से लेकर मई तक ये चुनाव चले थे. तो ऐसे में सरकार ने पहले अंतरिम बजट पेश किया, 1 फरवरी के दिन. फिर चुनाव हुए, नई सरकार बनी. पहले भी बीजेपी की सरकार थी, अभी भी बीजेपी की ही बनी, लेकिन टर्म नया था, और पहले वाला बजट अंतरिम था, इसलिए दोबारा बजट पेश किया गया. 5 जुलाई के दिन. नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे पेश किया.


बजट तो आ गया है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये बजट बनता कैसे है, और कौन-कौन मिलकर इसे बनाता है. हम आपको बताते हैं बजट से जुड़ी कुछ बेहद जरूरी बातें.

कौन बनाता है बजट?


बजट बनाने में वित्त मंत्रालय तो इसमें शामिल होता ही है, उसके अलावा नीती आयोग भी शामिल होता है. वित्त मंत्रालय के अलावा बाकी मंत्रालय, जिन्हें स्पैंडिंग मिनिस्ट्रीज़ कहते हैं, यानी जिनके ऊपर वित्त मंत्रालय को खर्च करना होता है, वो भी शामिल होते हैं. इनकम टैक्स विभाग इसमें शामिल होता है. फाइनेंस सेक्रेटरी, रेवेन्यू सेक्रेटरी, चीफ इकॉनोमिक एडवाइज़र, इक्स्पेन्डिचर सेक्रेटरी भी बजट बनाने में अहम रोल निभाते हैं.

संसद में बजट पेश करने से पहले निर्मला सीतारमण ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की थी. उस वक्त उनके साथ वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर, और वित्त मंत्रालय के कुछ अहम अधिकारी भी मौजूद थे. जो अधिकारी इस तस्वीर में दिख रहे हैं, उन्होंने बजट बनाने में बहुत ही अहम रोल निभाया है.

बजट क्या होता है?

सबसे पहले तो ये जान लीजिए कि हमारे संविधान में बजट शब्द का इस्तेमाल कहीं हुआ ही नहीं है. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 112 में ‘एनुअल फाइनेंशियल स्टेटमेंट’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है. हिंदी में कहें तो वार्षिक वित्तीय वित्तीय विवरण. लेकिन आम बोलचाल की भाषा में हम लोग इसे बजट कहते हैं.

1 अप्रैल से लेकर 31 मार्च तक एक वित्तीय वर्ष होता है. यानी फाइनेंशियल ईयर. एक वित्तीय वर्ष में, सरकार देश के लोगों पर कितना खर्च करेगी, किन योजनाओं पर कितना खर्च करेगी, किस जगह पर कितना टैक्स लिया जाएगा, पिछले वित्तीय वर्ष में सरकार ने कितना खर्च किया और कितना टैक्स मिला, इसका एक अनुमानित खाका संसद में पेश किया जाता है. यही बजट होता है.

बजट फरवरी में ही क्यों पेश होता है?

ताकि नया वित्तीय वर्ष शुरू होते-होते, पेश किए गए बजट को लागू किया जा सके. और इसे लागू करने के लिए जो जरूरी बदलाव करने हैं, उसे किया जा सके.

कैसे बनता है बजट?

अब इस बार तो 30-35 दिनों में ही बजट बन गया, क्योंकि नई सरकार के नए मंत्रियों ने शपथ 30 मई के दिन ली थी. लेकिन नॉर्मल कंडीशन में जो प्रोसेस फॉलो होती है, वो हम आपको बता रहे हैं.

देश के लिए बजट बनाना बहुत ही लंबी प्रोसेस है. इसे बनाने में पांच महीनों से भी ज्यादा का वक्त लगता है. और ये बहुत ही गुप्त तरीके से बनता है. प्रोसेस सितंबर के महीने से शुरू हो जाती है. वित्त मंत्रालय सबसे पहले एक सर्कुलर जारी करता है. जो बाकी सभी मंत्रालयों को, जिन्हें स्पैंडिंग मिनिस्ट्रीज़ कहते हैं, उन्हें भेजा जाता है. उनसे एक साल के खर्चे और टैक्स का अनुमानित खाका मांगा जाता है. पूछा जाता है कि उनका मंत्रालय एक साल में किन योजनाओं में कितना खर्च करने की प्लानिंग में है. फिर स्पैंडिंग मंत्रालय और डिपार्टमेंट्स अपनी मांग वित्त मंत्रालय को भेजते हैं.

सारे विभागों की मांगें पता चलने के बाद वित्त मंत्रालय इसकी जांच करता है. एक लंबी चर्चा होती है. सभी केंद्रीय मंत्रियों और वित्त मंत्रालय के इक्स्पेन्डिचर डिपार्टमेंट, यानी व्यय विभाग के बीच. इसी बीच वित्त मंत्रालय के इकॉनोमिक अफेयर्स विभाग और राजस्व विभाग के कुछ अधिकारी कुछ मुलाकातें करते हैं. किसानों, व्यापारियों, अर्थशास्त्रियों, सिविल सोसायटी के कुछ ग्रुप्स से बातें करते हैं. उनके विचार जानते हैं. जब ये सारी मीटिंग्स खत्म होती है, तब बजट का फर्स्ट कट बनाया जाता है. जिसे वित्त मंत्री के सामने पेश किया जाता है. वित्त मंत्री कुछ जरूरी प्रपोजल्स प्रधानमंत्री से भी डिस्कस करते हैं. राष्ट्रपति के सामने भी इसे रखा जाता है. पीएम से बातचीत होने के बाद ही फाइनल बजट को लॉक किया जाता है. उसके बाद इसे संसद में पेश किया जाता है.

बजट पेश करने से पहले निर्मला सीतारमण ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की थी. फोटो- ट्विटर वित्त मंत्रालय

तगड़ी सुरक्षा होती है.

ये सब कुछ वित्त मंत्रालय के अंदर ही होता है. सितंबर से जनवरी महीने के बीच होता है. जनवरी के महीने से ही पत्रकारों को वित्त मंत्रालय से दूर कर दिया जाता है. क्योंकि बजट बहुत ही गोपनीय तरीके से बनता है.

इसके अलावा इंटेलिजेंस ब्यूरो वित्त मंत्रालय की सुरक्षा का जिम्मा लेता है. इस तरह का सिस्टम सेटअप किया जाता है, जिससे बजट के किसी भी प्रपोजल का कोई भी हिस्सा बाहरी व्यक्ति को पता न चले, अहम अधिकारियों के फोन भी रिकॉर्ड किए जाते हैं. हर हिस्से में सीसीटीवी कैमरे लगे रहते हैं. इस दौरान जो कोई भी विजिटर वित्त मंत्रालय में आता है, उसके ऊपर कड़ी निगाह रखी जाती है.

वित्त मंत्रालय के बेसमेंट में एक प्रिंटिंग प्रेस रखी हुई है. बजट के दस्तावेज इसी प्रेस में प्रिंट होते हैं. बजट डे से करीब एक हफ्ते पहले से ही इस प्रिंटिंग प्रेस में काम करने वाले लोगों को सबसे अलग रखा जाने लगता है. एक हफ्ते तक ये 100 लोग अंदर ही रहते हैं. ताकि किसी भी तरह की कोई जानकारी बाहर न जाए.

प्रेस में काम करने वाले लोगों के लिए डॉक्टर्स की भी व्यवस्था रहती है. डॉक्टर्स एक फोन कॉल की दूरी पर रहते हैं. वो इसलिए कि अगर कभी किसी वर्कर की तबीयत बिगड़ जाए, तो डॉक्टर फौरन हाजिर हो जाए. इन वर्कर्स को जो खाना मिलता है, उसकी भी तगड़ी जांच होती है. ये चेक कर लिया जाता है कि खाने में कहीं जहर तो नहीं है.

तो इस तरह से देश के लिए वित्त मंत्री बजट तैयार करते हैं.

हर साल बजट को अंतिम रूप देने से कुछ दिन पहले नॉर्थ ब्लॉक में वित्त मंत्रालय के ऑफिस में एक बड़ी कढ़ाई में हलवा बनाया जाता है। वित्त मंत्री खुद इस कार्यक्रम में भाग लेते हैं। हलवा बनाने की रस्म काफी पहले से ही चली आ रही है। इसके पीछे कारण यही है कि हलवे को काफी शुभ माना जाता है और शुभ काम की शुरुआत भी मीठे से की जाती है।
बजट के सभी डॉक्युमेंट्स चुनिंदा अधिकारी ही तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले सभी कंप्यूटर्स को दूसरे नेटवर्क से डीलिंक कर दिया जाता है। बजट पर काम कर रहा लगभग 100 लोगों का स्टाफ करीब 2 से 3 हफ्ते नॉर्थ ब्लॉक ऑफिस में ही रहता है। कुछ दिन उनको बाहर आने की इजाजत नहीं होती।



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