सिर्फ लोकसभा चुनाव में बढ़ गया 400 गुना खर्च, ‘एक देश एक चुनाव’ से कम होगा खर्च

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सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) ने अपने रिसर्च में खुलासा किया कि 5 साल पहले 2014 लोकसभा चुनाव में 30 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे जो 2019 में बढ़कर दोगुना हो गया. यह दुनिया का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में लौटने के बाद एक बार फिर से ‘एक देश, एक चुनाव’ पर चर्चा शुरू कर दी है. राज्यसभा में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण पर हुई चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर ‘एक देश, एक चुनाव’ की बात करते हुए एक ‘मतदाता सूची’ तैयार करने की बात कही. मोदी ने कहा कि अभी तक कई जगह अलग-अलग मतदाता सूची है, लेकिन इसे हमें बदलना चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव को लेकर जो बातें की हैं आखिर वो कितनी तर्कसंगत हैं, इस पर नजर डालते हैं.
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश भारत में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते हैं, जिससे आचार संहिता लगे होने के कारण विकास संबंधी कार्यों पर असर पड़ता है. चुनाव के दौरान क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना भी बड़ी चुनौती होती है. इस कारण भारी सुरक्षा बलों की तैनाती भी चुनौतीपूर्ण होती है. बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों को चुनाव संबंधी कार्यों में लगाना पड़ता है, जिससे सरकारी काम में बाधा पहुंचती है. चुनाव को लेकर हर तरह की व्यवस्था में जन के साथ धन भी इस्तेमाल होता है. यह आम लोगों की जेब से ही जाता है
प्रेस इन्फॉरमेशन ब्यूरो और चुनाव आयोग की ओर से दिए गए आंकड़ों के अनुसार सिर्फ लोकसभा चुनाव में ही खर्च के बारे में इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि 1952 के चुनाव में प्रति वोटर 60 पैसा खर्च आया था, जो 2009 में 20 गुना बढ़कर 12 रुपए हो गया. 2014 में यही खर्च प्रति वोटर बढ़कर 42 रुपए हो गया. 2019 में माना जा रहा है कि 6500 करोड़ रुपए का खर्च आया. इस आधार पर प्रति वोटर यह खर्च 72 रुपए बैठता है.

एक साथ चुनाव कराने से करीब 70 हजार करोड़ की होगी बचत


‘एक देश एक चुनाव’ करवाने के लिए बड़ी संख्या में ईवीएम की जरूरत होगी. एक लोकसभा चुनाव में 12 से 13 लाख ईवीएम इस्तेमाल होता है. हर साल 4-5 राज्यों में होने वाले चुनाव के लिए 2 से 3 लाख ईवीएम की जरूरत होती है. अगर देश में एक साथ चुनाव कराए जाते हैं तो इसके लिए वर्तमान से दोगुने ईवीएम की दरकार होगी यानी 30 से 32 लाख ईवीएम की व्यवस्था करनी होगी. और फिर इतने ही VVPAT भी लगाए जाएंगे. इनके लिए करीब 5 हजार करोड़ अधिक खर्च होंगे.

यह सिस्टम लागू होने पर देश में चुनाव प्रक्रिया का समय बढ़ जाएगा. मतदान के चरण बढ़ सकते हैं. लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने पर सिक्योरिटी पर खर्च कम होगा. हर चुनाव के दौरान हर पोलिंग बूथ पर कम से कम 5 सुरक्षा कर्मी तैनात होते हैं तो इसमें होने वाले खर्च में कमी आएगी, क्योंकि एक ही बार इनकी तैनाती करनी होगी.


सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) की रिपोर्ट कहती है कि इस बार चुनाव में राजनीतिक दलों की ओर से करीब 60 हज़ार करोड़ खर्च किए गए हैं. इसी तरह हर राज्यों की विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने करीब 10-10 हजार करोड़ खर्च किए थे. 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा और 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 10 हज़ार करोड़ से ज्यादा का खर्च किया गया. इस तरह से दोनों चुनावों में राजनीतिक दलों की ओर से 1.20 लाख से 1.40 लाख करोड़ का खर्च होता है. अब अगर दो की जगह एक बार ही चुनाव हो तो खर्च आधा हो जाएगा. साथ ही टाइम भी बचेगा.

5 साल में हुए 37 बड़े चुनाव

अप्रैल 2014 से देश में हुए चुनावों की बात करें तो 2 बार लोकसभा चुनाव के अलावा 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के चुनाव कराए गए. 2014 में आम चुनाव के अलावा 8 राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए. 2015 में दिल्ली और बिहार जबकि 2016 में 5 राज्यों और 2017 में 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए गए. 2018 में सबसे ज्यादा 9 राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए गए. वहीं, इस साल अब तक लोकसभा चुनाव के साथ 4 राज्यों में विधानसभा के लिए चुनाव हुए.

60 हजार करोड़ खर्चः CMS

जून महीने की शुरुआत में सीएमएस की स्टडी में यह बात सामने आई कि 7 चरणों और 75 दिनों तक चले 17वें लोकसभा चुनाव में अकेले 60 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए. यह दुनिया का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ. प्रति वोट के हिसाब से देखा जाए तो एक वोट पर औसतन 700 रु. खर्च किए गए. वहीं, प्रति लोकसभा क्षेत्र में चुनाव के लिए हर संसदीय सीट पर औसतन 100 करोड़ रु. खर्च किए गए.

सीएमएस ने खुलासा किया कि 5 साल पहले 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 30 हजार करोड़ रु. खर्च हुए थे, जो 2019 में बढ़कर दोगुना हो गया. सीएमएस ने दावा किया कि इस चुनाव में 12 से 15 हजार करोड़ रुपए मतदाताओं, 20 से 25 हजार करोड़ रुपए विज्ञापन, 5 हजार से 6 हजार करोड़ रुपए लॉजिस्टिक पर खर्च हुए. इसके अलावा 10 से 12 हजार करोड़ रुपए औपचारिक खर्च था, जबकि 3 से 6 हजार करोड़ रुपए अन्य मदों पर खर्च हुए. इस तरह से यह खर्च 55 से 60 हजार करोड़ के बीच पहुंच जाता है. जबकि चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त खर्च की वैध सीमा 10 से 12 हजार करोड़ रुपए रखी गई थी.

1952 से 2014 में 369 गुना खर्च बढ़ा

गुजरते वक्त में चुनाव पर खर्च बढ़ता ही जा रहा है. चुनाव जिस तेजी से हाईटेक हो रहे हैं ऐसे में चुनाव आयोग के सामने निष्पक्ष और सुचारू तरीके से चुनाव करवाना बेहद पेचीदा और खर्चीला हो गया है. 1998 से लेकर 2019 यानी पिछले 21 साल में हुए आम चुनाव खर्च में 6 से 7 गुना की बढ़ोतरी हुई है. 1998 के लोकसभा चुनाव में खर्च करीब 9 हजार करोड़ रुपए था जो अब बढ़कर 55 से 60 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. लोकसभा चुनाव में खर्च की बात करें तो चुनाव आयोग के अनुसार, 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में 10.5 करोड़ रुपए खर्च हुए थे. जबकि 1957 का चुनाव अब तक का सबसे सस्ता चुनाव था. इस चुनाव में 5.9 करोड़ रुपए खर्च हुए थे.

अब तक लोकसभा चुनाव में हुए खर्च

1952 -10.5 करोड़ रुपए

1957 -5.9 करोड़ रुपए

1962 -7.3 करोड़ रुपए

1967 -10.8 करोड़ रुपए

1971 -11.6 करोड़ रुपए

1977 -23.0 करोड़ रुपए

1980 -54.8 करोड़ रुपए

1984-85 -81.5 करोड़ रुपए

1989 -154.2 करोड़ रुपए

1991-92 -359.1 करोड़ रुपए

1996 -597.3 करोड़ रुपए

1998 -666.2 करोड़ रुपए

1999 -947.7 करोड़ रुपए

2004 -1016.1 करोड़ रुपए

2009 -1114.4 करोड़ रुपए

2014 -3870.3 करोड़ रुपए

2019 -आंकड़े अनुपलब्ध

(अनुमानित आंकड़े- by ECI)

चुनाव आयोग की ओर से 2019 चुनाव पर हुए खर्च को लेकर अभी कोई आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं, लेकिन इस चुनाव में करीब 9 करोड़ मतदाताओं को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना था, जिसमें 67 फीसदी मतदाताओं (करीब 6 करोड़) ने मतदान में हिस्सा लिया.

‘एक देश एक चुनाव’ के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा कि 1952 से लेकर आज तक चुनाव में सुधार होते रहे हैं, लेकिन आज इसे नकार देना गलत है, इस पर चर्चा लगातार होनी चाहिए. पीएम ने कहा कि समय की मांग है कि आज कम से कम मतदाता सूची और पोलिंग स्टेशन एक ही होने चाहिए. एक ही मतदाता सूची होने पर खर्च में कटौती होगी.

साल 1952, 1957, 1962, 1967 में एक साथ लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं लेकिन ये सिलसिला 1968-69 में टूट गया. विधि आयोग के अनुसार 4,500 करोड़ रुपए में नई ईवीएम 2019 में ही खरीदने पड़ते अगर एक साथ चुनाव होते. हालांकि 2024 में एक साथ चुनाव कराने के लिए 1751.17 करोड़ सिर्फ ईवीएम पर खर्च करने पड़ेंगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘एक देश एक चुनाव’ के मुद्दे पर पिछले दिनों सभी राजनीतिक दलों की बैठक भी बुला चुके हैं. मोदी जिस तरह से इस मुद्दे को उठा रहे हैं इससे लगता है कि यह मामला आगे भी जारी रहेगा. ‘एक देश एक चुनाव’ की प्रक्रिया शुरू होने से खर्च में काफी कटौती होगी और समय की बर्बादी भी नहीं होगी. 1952 से लेकर 2019 तक के लोकसभा चुनाव में खर्च 400 गुना से ज्यादा बढ़ गया है. ऐसे में इस पर सभी राजनीतिक दलों को विचार करना चाहिए.



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